Monday, 1 December 2014

*भीख*
मैं वहाँ घुटनो पर बैठी हर बार की तरह उनसे भीख माँग रही थी:
" भगवान जी बस आज बचा लो, अगली बार गाड़ी पक्का धीरे चलाउंगी | बस इसको मरने मत देना वरना पापा फिर कभी वापस गाड़ी नही देंगे | "
उन्हे तोड़ा घूस देकर भी पटाना चाहा :...
" आज संभाल लो आप, दो किलो बेसन के लड्डू चढ़ाउंगी वो भी अपनी जेब से पैसे लगा कर | बस आज आखरी बार बचा लो | "
मेरा गिड़गिडाना अभी चल ही रहा था, की उसकी माँ पीछे से भागती हुई आईं | मैं डर गयी थी की कहीं वो मुझे देखकर भड़क ना पड़ें या कहीं मुझे पुलिस के हवाले ना कर दें |
मैं झट से जाकर मूर्ति के पीछे छिप गयी |
उनकी सिसकियों के आहटें सुनाई दे रहीं थीं | धीरे से झाँक कर देखा तो उनकी सफेद साड़ी पूरी खून से रंगी थीं | उन्ही के बेटे के खून से | माँग सुनी थी | ना कलाई में कड़े थे ना पैरों में बिछुवे |
उन्होने वहाँ भीक नहीं माँगी | ना ही गिड़गिडाई | बस उपर वाले से इतना कह गयीं:
' अगर मुझसे मेरा आखरी सहारा छीना, तो मेरे लिए भी अपने घर में दरवाज़े खुले रखना | कोई नहीं बचेगा जिसके लिए जी सकूँ मैं | '
मैं सुन्न रह गयी | अपनी ग़लती पर पछताने के सिवाय और कर भी क्या सकती थी | पर शायद पहली बार फूट फूट कर रोने का दिल कर रहा था |
और फिर दुवा माँगी तो बस इतनी की
" इस बार मेरी मत सुनना आप | बस उनकी सुन लो | एक माँ को उसका बेटा लौटा दो | उसे उसकी ज़िंदगी की भीख दे दो भगवान| "

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