Ainak
Monday, 1 December 2014
कभी खुदगर्ज़ी से उपर उठकर देखना,
इंसानियत में अपना ही मज़ा है,
कभी मुर्दों को जगा कर पूछना,
जीने का भी अपना ही मज़ा है |
वैसे तो उन्हे रिश्तों मे कुछ ख़ासा दिलचस्पी नहीं थी,
पर जब से ये love affair वाली ब्यार चली है-
तबसे उन्हे कभी अकेले नहीं देखा |
कहने को तो हमे उनकी आहटो से भी प्यार हो गया,
पर उस रोज़ अगर पलकों पर पर्दे ना होते, तो और बात थी |
मुझसे बार बार कहे जाते हैं ये लम्हे कि किसी रोज़ हम फिर यादो मे लौट आएँगे तेरे दामन में,
कम से कम उस रोज़ तो हमसे नज़रे मिलाने की हिम्मत रखना !
मैने यादों के पन्नो को तो मसल कर राख कर दिया,
पर ये राख भी जब उड़ उड़ कर आती है, तो तेरी ही तस्वीर खींच जाती है |
मैं उठा था उस रोज़ फिर फिसलने से पहले,
बस पाँव धँस गये थे तबतक अफवाहों की कब्र में !
यूँ बार बार रूठ कर, 'कट्टी' ना कह जाया करो,
हर बार मनाने के बहाने मै तेरे और करीब आ जाता हूँ |
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