Sunday, 22 January 2017

ये जो सर पर चुनर तूने बड़े सलीके से डाली है
अरमानो की अर्थी तूने हाय! बड़े तरीके से निकली है|
उस सर्दी की धूप में बैठे, जो सपने तूने बोए थे
कहती तो थी पढ़ूंगी आगे, अफ़सर बनूँगी
बड़े शहर में जाकर, बेटी होने पे नाज़ करूँगी
क्या हुआ?
ये शादी को तूने अधमरे मन से हां कह कर
चुनर से सर ढँककर, मेहन्दी रचाकर
कक्षा से नाम काटकर
सपनो को दफ़ना दिया?
क्या किया?
अरे पगली,
वो तेरे सपने वाला बंगला खाली रह जाएगा
तेरी अफ़सर वाली कुर्सी, फटे कुर्ते वाला ले जाएगा |
कह दे उनसे, बस एक बार, तेरे सपने उँचे हैं
जज़्बा तेरा सक्त है, इरादे अडिग|
जब लड़के वाले आए थे, तेरे पापा से बतियाए थे
'मेरी लाडो है ये' तेरे पापा दहेज की बात पर दोहराए थे
जा कह दे उनसे, उनकी लाडो उड़ने को बेताब है
आज नहीं, तो कब कहेगी ?
चल आज फिर इस सर्दी की धूप में बैठकर
सपने बोते हैं
एक तेरा, एक मेर
सर की चुनर को कमर में कसते हैं
चल उड़ते हैं
मुस्कुराते हैं
जीते हैं, इस बार
अपने लिए, अपने सपनों के नाम!

Monday, 21 November 2016

बेकार बैठे रहियेगा इस तरह
हर रोज़
मेरी तरह
तो बेशक ये यादों का सिलसिला तो ज़ारी रहेगा|
दूर दराज, पन्नो में लिपटे
कुछ उस दिन का, कुछ इस मौसम का
टुकड़ा टुकड़ा
मन में मचलता रहेगा |
खोल के चित्ठों को, यूँ ही
बस आप भी
मेरी तरह
निहारते रहियेगा |
तकरारों का, ज़िद से उठी दीवारों का
एक रवइया आपका
एक रवइया मेरा भी,
रह-रह कर फिर आप भी, कहियेगा
मेरी तरह
उसने मुझे बर्बाद किया |
ये हाल जो हुआ है आपका, कुछ
मेरी तरह
आख़िर अब मान लीजिये आप भी
मामूली यादों से हमने खुद को शाद किया |
क्या बैठे हैं आप भी
बेकार में
उस बात को लिये
मेरी तरह,
चलिये जाइये |
अब मुस्कुराइये |
किसी रोज़ जो मुडियेगा उस राह पर
आप फिर
तो देखियेगा कि कहीं फिर
उलझ ना जाइयेगा
आप भी
मेरी तरह |

Thursday, 28 July 2016

यूँ बार बार रूठ कर, 'कट्टी' ना कह जाया करो,
हर बार मनाने के बहाने मै तेरे और करीब आ जाता हूँ |
ना खत लिखे, ना हाल पूछा 
ना तुम लौटे, ना मेरा खत पहुँचा 
हमने तुम्हारे बिना जीने का कई बार सोचा |
हर बार किसी के जाने के गम में, ये आँखें नम नहीं होतीं,
कई बार खुद के बदलते चेहरे ही, खुद पर रोने को, मजबूर कर जातें हैं !
खैर
रही बात पुरानी
तो अब खुछ तब सा नहीं !
बातें , रातें 
मुस्कुराहटें
हंसी, ठिठोलें
सब पीछे छूट गये |
शायद ज़िन्दगी भी |
बड़े दिनो के बाद याद आज फिर अम्मा की आई है |
छोटे छोटे सपनो वाली वो मीठी पुरवाई है
सन्नाटो को चीरती वो मधुर शहनाई है
आँचल के कोनो मे सिमटी वो कठिन सिलाई है
लोरी की चौपाई से सरकती माँ अंगड़ाई है
अंधेरों में रहने वाली वो मेरी परछाईं है
बड़े दिनो के बाद याद आज अम्मा की आई है |
कभी थपकी देकर परिलोक की सैर मुझे करती है
कभी मुझे खिलाकर खुद भूखा सो जाती है
वो तो उजड़े घर मे खिलखिलती फुलवारी है
माँ तो हंस कर अंधेरे मे खुद जल जाती है
कभी कभी तो मुझे डाँट कर खुद रोने लग जाती है
हर रात अकेले सोने से पहले याद अम्मा की आती है |
भीतर भीतर बलके फिर भी रेशम से वो रहती है
तिनका तिनका बुनकर यादों की खुश्बू बोती है
दुखड़ों की नइया में बैठी वो मुझे हंसाया करती है
कभी निर्मल कभी कठोर वो कलकल बहती रहती है |
हर शाम जैसे फीकी पड़ती है
मन से बस एक आह निकलती है
माँ तू गर पास होती
तो रख गोद मे सर बस जब इतना कहती
"मेरी लाडो सबसे प्यारी"
तो मैं भी आँखे मींझ कर झट से सो जाती
माँ दूर देश में याद तेरी बड़ी आती |